SSC CPO 2026: दिल्ली पुलिस और CAPF में 1,871 SI पद • SSC CHSL भर्ती 2026: ₹92,300 तक सैलरी, आवेदन 7 अक्टूबर तक • CM अनुप्रति योजना 2026-27: फीस + ₹40,000 भत्ता, पूरी जानकारी • RPSC SI Hindi Paper 2021 — 120 मिनट का असली CBT टेस्ट दें • जूनियर इंजीनियर भर्ती 2026 — आवेदन 22 सितंबर तक • IBPS RRB भर्ती 2026: PO और क्लर्क, परीक्षा तिथि भी घोषित • Rajasthan Current Pulse — राजस्थान के वस्त्र एवं आभूषण | भाग 3 (27 MCQ) • GDS भर्ती 2026: 10वीं पास, बिना परीक्षा सीधी नियुक्ति •
Rajasthan Vastra Abhushan Quiz के इस भाग में राजस्थान के वस्त्र और आभूषणों से जुड़े 27 बहुविकल्पीय प्रश्न दिए गए हैं, जो राजस्थान सरकार की कॉलेज शिक्षा पाठ्यपुस्तक ‘राजस्थान की संस्कृति’ के अध्याय 4 (पृष्ठ 48–52) पर आधारित हैं। इसमें पुरुष एवं स्त्री परिधान, पगड़ी की विविध शैलियाँ, लहरिया, मोठड़ा, पोमचा व चूनरी जैसी रंगाई विधियाँ, सांगानेर, बगरू और बाड़मेर की छपाई, गोटा, कशीदा व पेचवर्क तथा सिर से पाँव तक पहने जाने वाले आभूषणों के नाम शामिल हैं। प्रश्नों का स्तर मध्यम से कठिन रखा गया है, इसलिए यह सेट RAS प्री, RPSC व्याख्याता, द्वितीय श्रेणी शिक्षक, पटवारी, राजस्थान पुलिस तथा RSSB की अन्य भर्ती परीक्षाओं की तैयारी करने वालों के लिए उपयोगी है। यह खंड नामों से भरा है और यहीं अभ्यर्थी सबसे ज़्यादा उलझते हैं। हर प्रश्न के साथ विस्तृत व्याख्या, एक ‘परीक्षा दृष्टि’ तथ्य और स्रोत पृष्ठ दिया गया है। इस श्रृंखला के पहले दो भाग चित्रकला और लोककलाओं पर हैं, उन्हें भी हल करें। राजस्थान की लोककलाएं: 25 सवाल, आप कितने सही करेंगे?Rajasthan Current Pulse — राजस्थान चित्रकला एवं चित्रशैलियाँ |…
Rajasthan Vastra Abhushan Quiz के इस भाग में राजस्थान के वस्त्र और आभूषणों पर आधारित 25 बहुविकल्पीय प्रश्न दिए गए हैं, जो पाठ्यपुस्तक ‘राजस्थान की संस्कृति’ के अध्याय 4 (पृष्ठ 48–52) से तैयार किए गए हैं। पुरुष व स्त्री परिधान, पगड़ी की शैलियाँ, लहरिया-मोठड़ा-पोमचा-चूनरी जैसी रंगाई विधियाँ, सांगानेर-बगरू-बाड़मेर की छपाई, गोटा व कशीदा तथा सिर से पाँव तक के आभूषणों के नाम — सब इसमें शामिल हैं। नीचे पहले यह समझिए कि इस खंड से प्रश्न किस ढाँचे में बनते हैं, फिर क्विज़ हल कीजिए।
📊 परीक्षा विश्लेषण — वस्त्र व आभूषण खंड से कैसे प्रश्न बनते हैं
कला एवं संस्कृति के अन्य उपखंडों की तुलना में वस्त्र और आभूषण वाला हिस्सा सबसे ज़्यादा नामों से भरा है। यहाँ अवधारणाएँ कम और शब्द ज़्यादा हैं, इसलिए इसे समझने से ज़्यादा व्यवस्थित करने की ज़रूरत होती है। जो अभ्यर्थी इन नामों को श्रेणियों में बाँटकर पढ़ता है, वह दो-तीन अंक आसानी से बना लेता है; जो सीधे पढ़ने बैठता है, वह विकल्पों में उलझ जाता है।
पहला ढाँचा — स्थान और उत्पाद की जोड़ी। यह सबसे आम है। बाड़मेर की अजरख, बगरू की स्याह बैगर, सांगानेर के सौम्य अलंकरण, अकोला की बड़े पैमाने की छपाई, खण्डेला का गोटा उद्योग, कैथून-माँगरोल का मसूरिया, मथानियाँ की मलमल, जालोर-मारोठ की टुकड़ी, जोधपुर की जोधाणा चुनरी, नाथद्वारा की तारकशी और प्रतापगढ़ की थेवा कला — इन जोड़ियों में से कोई भी उठाकर पूछा जा सकता है। ध्यान दीजिए कि बगरू और सांगानेर दोनों जयपुर में हैं पर उनकी छपाई अलग है, और यही अंतर विकल्पों में जाल बनाता है।
दूसरा ढाँचा — पारिभाषिक शब्द का अर्थ। मोठड़ा, पोमचा, अमोवा, मलागिरि, चटापटी, पेचवर्क, लप्पा और लप्पी, रखन, चूंप, मोकड़ी, कातर्या, कडूल्या, मुरकी — इन शब्दों का अर्थ पूछा जाता है या दो मिलते-जुलते शब्द आपस में बदल दिए जाते हैं। जैसे लहरिया और मोठड़ा में अंतर केवल इतना है कि आड़ी धारियाँ एक ओर से हैं या दोनों ओर से काटती हुई। इसी तरह मोकड़ी लाख की चूड़ी है और कातर्या काँच की — दोनों हाथ के ही आभूषण हैं, इसलिए विकल्प में साथ रखे जाते हैं।
तीसरा ढाँचा — शरीर के अंग से आभूषण का मिलान। आभूषणों की सूची इतनी लंबी है कि प्रश्न प्रायः यही पूछता है कि अमुक आभूषण कहाँ पहना जाता है। सिर पर बोर, बोरला, शीशफूल, रखड़ी व टिकड़ा; कान में कर्णफूल, पीपलपत्रा, झेला, अंगोट्या व टोटी; नाक में नथ, बेसर, बारी, भोगली, कांटा, चूनी व चोप; पाँव में पायल, पायजेब, झाँझर, नेवरी, लंगर व नूपुर। नाक और कान के आभूषणों के नाम सबसे ज़्यादा गड़बड़ाते हैं, इसलिए इन दोनों सूचियों को अलग-अलग याद कीजिए।
चौथा ढाँचा — संख्या और वर्गीकरण। लहरिया एक, दो, तीन, पांच और सात रंगों में बनता है और पांच शुभ मानी जाने के कारण मांगलिक अवसरों पर पंचरंग लहरिया पहना जाता है — इस तरह की संख्यात्मक जानकारी सीधे प्रश्न बनती है। इसी श्रेणी में भौगोलिक संकेतक प्राप्त तीन उत्पाद — सांगानेरी हैण्डब्लाक प्रिंट, बगरू हैण्डब्लॉक प्रिंट और कोटा डोरिया — भी आते हैं, जो हाल के वर्षों में अक्सर पूछे जाने वाला तथ्य है।
🎯 तैयारी रणनीति — इतने सारे नाम कैसे याद रखें
इस खंड की सबसे बड़ी चुनौती नामों की संख्या है, इसलिए तरीका भी उसी हिसाब से चुनिए।
आभूषणों को शरीर के क्रम में पढ़िए। सिर से शुरू कीजिए और पाँव पर खत्म — सिर, कान, नाक, कण्ठ, वक्ष, हाथ, उंगली, कमर, पाँव। इसी क्रम में कागज़ पर नौ खाने बनाइए और हर खाने में उसके आभूषण भरिए। मस्तिष्क सूची से ज़्यादा स्थान याद रखता है, इसलिए यह ढाँचा एक बार बन जाने पर प्रश्न पढ़ते ही सही खाना सामने आ जाता है। पाठ्यपुस्तक में दिया स्त्री आभूषणों का चित्र भी इसी काम आता है।
वस्त्रों को नक्शे पर रखिए। छपाई और बुनाई वाले हर केन्द्र को राजस्थान के खाके पर अंकित कीजिए — पश्चिम में बाड़मेर की अजरख, मध्य में जयपुर के बगरू व सांगानेर, दक्षिण-पूर्व में कोटा की डोरिया व बारां का मसूरिया, उत्तर में सीकर का खण्डेला गोटा, और मारवाड़ में जोधपुर, पीपाड़, पाली व मथानियाँ। नक्शे पर देखी हुई जोड़ी सूची में रटी हुई जोड़ी से कहीं ज़्यादा टिकती है।
मिलते-जुलते शब्दों की जोड़ी सूची बनाइए। एक अलग पन्ने पर केवल वे शब्द लिखिए जो आपस में उलझते हैं — लहरिया बनाम मोठड़ा, मोकड़ी बनाम कातर्या, रखन बनाम चूंप, लप्पा बनाम लप्पी, गोटा बनाम बांकड़ी, चटापटी बनाम पेचवर्क, बगरू बनाम सांगानेर। हर जोड़ी के आगे एक पंक्ति में अंतर लिखिए। परीक्षा से पहले यही पन्ना सबसे ज़्यादा काम आएगा, क्योंकि प्रश्न ठीक इन्हीं जोड़ियों से बनते हैं।
रंग और अवसर को साथ जोड़िए। बेटे के जन्म पर पीला पोमचा और बेटी के जन्म पर गुलाबी, श्रावण-तीज पर लहरिया, विवाहोत्सव पर मोठड़े की पगड़ी, दशहरे पर मदील, होली पर फूल-पत्ती की छपाई वाली पगड़ी, मांगलिक अवसरों पर पंचरंग लहरिया। ये सब अवसर-आधारित तथ्य हैं और इन्हें एक छोटी तालिका में एक साथ लिख लेने पर अलग-अलग याद करने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
वर्णनात्मक पेपर के लिए एक अतिरिक्त परत। यदि आप RPSC के वर्णनात्मक प्रश्नपत्र की तैयारी कर रहे हैं तो केवल नाम पर्याप्त नहीं होंगे। वहाँ यह लिखने की क्षमता चाहिए कि राजस्थानी वेशभूषा की सबसे बड़ी विशेषता उसका बिरंगापन है, कि लाल रंग की विविधता के कारण ही “मारू थारे देश में उपजे तीन रतन, इक ढोला, दूजी मारवण तीजो कसूमल रंग” जैसी कहावत बनी, और कि पगड़ी केवल सिर की रक्षा नहीं बल्कि सामाजिक स्थिति व धार्मिक भावना की अभिव्यक्ति भी रही है — इसीलिए “पगड़ी की लाज रखना” कहावत आज भी प्रचलित है। ऐसे दो-तीन वाक्य उत्तर की शुरुआत को मज़बूत बना देते हैं।
वस्त्र उद्योग का ऐतिहासिक आधार
राजस्थान में वस्त्र निर्माण कोई नयी परम्परा नहीं है। कालीबंगा और आहड़ सभ्यता के उत्खनन में मिले रुई कातने के चक्र और तकली बताते हैं कि उस काल में भी सूती वस्त्रों का उपयोग होता था। मध्यकाल तक आते-आते इस परम्परा को राजकीय संरक्षण मिला — सवाई जयसिंह द्वारा स्थापित छत्तीस कारखानों में से सीवन खाना, रंगखाना और छापाखाना सीधे वस्त्रों से जुड़े थे, जहाँ क्रमशः कपड़े सिले, रंगे और छापे जाते थे। मुगलों के सम्पर्क ने परिधानों में विविधता जोड़ी और पगड़ी की अनेक शैलियाँ प्रचलन में आयीं। यही निरंतरता आज भी दिखती है — पुरुष वेशभूषा में भले ही देश भर ने पश्चिमी परिधान अपना लिया हो, पर राजस्थान का बन्द गला या जोधपुरी कोट आज भी अपना अलग स्थान बनाए हुए है।
📚 त्वरित रिवीजन — एक नज़र में
वस्त्र / कला
प्रमुख केन्द्र
पहचान
अजरख छपाई
बाड़मेर
लाल-नीले रंग में दोनों ओर की छपाई, ज्यामितीय अलंकरण
स्याह बैगर
बगरू (जयपुर)
मटिया जमीन पर लाल-काले संयोजन
हैण्डब्लाक प्रिंट
सांगानेर (जयपुर)
सौम्य मोहक रंग, लयात्मक बूटियाँ
चुनरी छपाई
आहड़, भीलवाड़ा
लाल व काले रंग
बंधेज चुनरी
जोधपुर (जोधाणा), सीकर
चमकीले रंग, बारीक बंधेज
मसूरिया
कैथून, माँगरोल (बारां)
बुनकरों का उत्कृष्ट कपड़ा
मलमल
मथानियाँ (जोधपुर)
महीन बुनाई
टुकड़ी
जालोर, मारोठ
मारवाड़ का सर्वोत्तम देशी कपड़ा
गोटा उद्योग
खण्डेला (सीकर)
बादले के बाने से बुनी बेल
पेचवर्क
शेखावाटी
रंगीन कपड़े काटकर सिलाई
तारकशी
नाथद्वारा
चांदी के बारीक तारों का काम
थेवा कला
प्रतापगढ़
काँच के बीच सोने का बारीक काम
स्रोत एवं संबंधित क्विज़
इस क्विज़ के सभी प्रश्न राजस्थान सरकार की कॉलेज शिक्षा पाठ्यपुस्तक ‘राजस्थान की संस्कृति’, अध्याय 4 — राजस्थान के वस्त्र और आभूषण (पृष्ठ 48–52) से तैयार किए गए हैं।
💡 कैसे शेयर करें: Text कॉपी करें → WhatsApp खोलें → किसी भी ग्रुप या दोस्त को भेजें
✅ Text कॉपी हो गया! अब WhatsApp खोलकर paste करें।
SCइस पोस्ट के लेखकSarita Choudharyपरिचय
मैं सरिता चौधरी, RajasthanGovtJob.com की कंटेंट संपादक हूँ।
यह पोर्टल योगेंद्र बेनीवाल (जयपुर) द्वारा संचालित है, और यहाँ
प्रकाशित होने वाली हर भर्ती, परिणाम व प्रवेश पत्र की सूचना
मेरे स्तर पर जाँच से गुज़रती है।
काम का तरीक़ा सीधा है — कोई भी सूचना तब तक प्रकाशित नहीं होती
जब तक वह RPSC, RSSB, RRB या संबंधित विभाग की आधिकारिक
अधिसूचना से मिला न ली जाए। पद संख्या, तिथि और पात्रता सीधे
अधिसूचना PDF से ली जाती है, किसी दूसरी वेबसाइट से नहीं। जहाँ
कोई जानकारी अभी घोषित नहीं हुई, वहाँ अनुमान लगाने के बजाय
साफ़ लिख दिया जाता है कि सूचना प्रतीक्षित है।
अभ्यर्थी अक्सर एक ही सवाल लेकर आते हैं — "फ़ॉर्म कब तक भरा
जा सकता है" और "योग्यता में मैं आता हूँ या नहीं"। इसीलिए हर
पोस्ट में तिथियाँ और पात्रता सबसे ऊपर रखी जाती हैं, और आवेदन
की अंतिम तिथि निकल जाने पर पोस्ट पर स्थिति स्पष्ट लिख दी
जाती है, ताकि कोई बंद हो चुकी भर्ती के भरोसे न बैठा रहे।
यह एक निजी सूचना पोर्टल है, किसी सरकारी निकाय से संबद्ध नहीं।
अंतिम पुष्टि हमेशा आधिकारिक अधिसूचना से ही करें। किसी त्रुटि
या सुधार के सुझाव के लिए contact@rajasthangovtjob.com पर
लिखें — सुधार उसी दिन कर दिया जाता है।
Q1. लहरिया में यदि आड़ी धारियाँ दोनों ओर से एक-दूसरे को काटती हुई बनी हों तो वह क्या कहलाता है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
यदि आड़ी धारियाँ केवल एक ओर से हों तो वह लहरिया कहलाता है, किन्तु दोनों ओर से एक-दूसरे को काटती हुई आ रही हों तो वह मोठड़ा कहलाता है। परीक्षा दृष्टि: मोठड़े की पगड़ी विवाहोत्सव पर पहनी जाती है, जबकि श्रावण में लहरिया और दशहरे पर मदील पगड़ी का प्रचलन रहा है। स्रोत: राजस्थान की संस्कृति, अध्याय 4, पृ. 48-49
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q2. पोमचा ओढ़नी देने की परम्परा में बेटे और बेटी के जन्म पर क्रमशः कौनसे रंग का पोमचा दिया जाता है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
पोमचा का अर्थ है कमल फूल के अभिप्राय युक्त ओढ़नी। नवजात शिशु की माँ के लिए मातृ पक्ष की ओर से बेटे के जन्म पर पीला पोमचा और बेटी के जन्म पर गुलाबी पोमचा देने की परम्परा है। परीक्षा दृष्टि: रंगाई के तीन प्रमुख प्रकार पोमचा, लहरिया एवं चूनरी हैं, तथा रंगाई का काम रंगरेज या नीलगर करते हैं। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 49
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q3. 'जोधाणा' नाम से प्रसिद्ध चुनरी किस नगर की देन है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
जोधाणा अर्थात् जोधपुर की बनी चुनरी के रंग बड़े चमकीले, टिकाऊ होते हैं और बंधेज बारीक होता है। परीक्षा दृष्टि: सीकर यानी शेखावाटी के बंधेज की गिनती भी बारीक बंधेजों में होती है, तथा बंधेज तकनीक में बनी चुनरी के बिना कोई भी मांगलिक कार्य अपूर्ण माना जाता है। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 49
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q4. 'मलागिरि' (मलयगिरि) वस्त्र की क्या विशेषता थी?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
पहले राजस्थान में मलागिरि अर्थात् भूरे रंग में रंगा हुआ वस्त्र वर्षों तक सुगंधित रहता था। परीक्षा दृष्टि: सिटी पैलेस जयपुर में रखी हुई महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय की अंगरखियाँ आज तक सुगंधित हैं - यह तथ्य सीधे पूछा जाता है। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 50
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q5. 'अमोवा' नामक वस्त्र का प्रयोग कौन करते थे?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
अमोवा का प्रयोग शिकारी करते थे, इसका रंग खाकी रंग से मिलता-जुलता था। परीक्षा दृष्टि: व्यवसाय के अनुसार परिधान बदलते थे - सुनार ऑंटे वाली पगड़ी तथा बनजारे मोटी पट्टेदार पगड़ी पहनते थे, और उच्च वर्ग के लोग चीरा व फेंटा बाँधते थे। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 48 व 50
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q6. अजरख पद्धति की छपाई किस क्षेत्र की विशेषता है और उसकी पहचान क्या है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
बाड़मेर अजरख पद्धति से छपे वस्त्रों के लिए विख्यात है, जिसमें लाल और नीले रंग में दोनों ओर की छपाई होती है - यही इसकी विशेषता है। परीक्षा दृष्टि: इसके अलंकरण ज्यामितीय होते हैं और तुर्की टाइलों से बहुत मिलते हैं। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 50
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q7. 'छीपों का अकोला' नाम किस कारण पड़ा?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
अकोला में बड़े पैमाने पर छपाई होने के कारण यह कस्बा छीपों का अकोला कहलाता है। परीक्षा दृष्टि: आहड़ और भीलवाड़ा में मुख्य रूप से लाल और काले रंग में चुनरी की छपाई होती है, पर ओढ़नी को आकर्षक बनाने के लिए तोता, मोर या फूल-पत्ती पीले, गुलाबी और हरे रंग से बनाए जाते हैं। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 50
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q8. जयपुर का बगरू किस विशिष्ट छपाई के लिए विख्यात है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
बगरू अपने स्याह बैगर यानी काला लाल छपाई के लिए विख्यात है, जिसमें मटिया रंग की जमीन पर लाल-काले में फूल-पत्ती, पशु-पक्षी और अनेक प्रकार के संयोजन बनाए जाते हैं। परीक्षा दृष्टि: बगरू और सांगानेर दोनों जयपुर में हैं पर उनकी छपाई अलग है - सांगानेर सुरुचिपूर्ण सौम्य अलंकरण के लिए जाना जाता है। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 50
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q9. सांगानेर की छपाई की पहचान क्या मानी जाती है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
सांगानेर में अन्य स्थानों से भिन्न प्रकार के अत्यन्त उत्तम व सुरुचिपूर्ण अलंकरण छपते हैं, जिनका प्रमुख योगदान सुन्दर, सौम्य और मोहक रंगों तथा लयात्मक बूटियों में है। परीक्षा दृष्टि: पंखुड़ियों का घुमाव, पत्तियों का झुकाव और फूलों की बारीकी देखकर प्रतीत होता है मानो ठप्पा बनाने वाले खरादी ने फूलों का वैज्ञानिक अध्ययन किया हो। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 50
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q10. भौगोलिक संकेतक (GI) की श्रेणी में राजस्थान के कौनसे तीन वस्त्र-उत्पाद शामिल हैं?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
सांगानेरी हैण्डब्लाक प्रिंट, बगरू हैण्डब्लॉक प्रिंट तथा कोटा डोरिया को हैण्डीक्राफ्ट से संबंधित श्रेणी में भौगोलिक संकेतक प्राप्त हो चुका है। परीक्षा दृष्टि: भौगोलिक संकेतक औद्योगिक संपत्ति का एक पहलू है जो किसी उत्पाद के देश या उत्पत्ति स्थान का हवाला देता है और गुणवत्ता व विशिष्टता का आश्वासन देता है। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 50
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q11. 'मसूरिया' वस्त्र किन स्थानों से जुड़ा है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
बुनकरों द्वारा तैयार उत्कृष्ट कपड़ों में कैथून तथा माँगरोल (बारां) का मसूरिया प्रमुख है। परीक्षा दृष्टि: इसी सूची में तनसुख, मथानियाँ (जोधपुर) की मलमल तथा बीकानेर-जैसलमेर की ऊन भी आती है, जो विविध मूल्यवान परिधान बनाने के काम आती थी। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 50
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q12. मारवाड़ के देशी कपड़ों में सर्वोत्तम मानी जाने वाली 'टुकड़ी' किन कस्बों में अच्छी बनती थी?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
टुकड़ी मारवाड़ के देशी कपड़ों में सर्वोत्तम मानी जाती थी और यह जालोर तथा मारोठ कस्बों में अच्छी बनती थी। परीक्षा दृष्टि: छपाई का काम आज संपूर्ण राजस्थान में होता है, पर पीपाड़, जोधपुर एवं पाली में बड़े व सशक्त अलंकरण छपते हैं जिनमें लाल, काले, नीले और हरे रंगों की प्रमुखता रहती है। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 50
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q13. 'चटापटी' किस प्रकार की सज्जा तकनीक है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
वस्त्रों को सजाने के लिए चटापटी के अंतर्गत किसी आकृति को कपड़े में काट कर दूसरे कपड़े पर टांक दिया जाता था। परीक्षा दृष्टि: इसका प्रयोग जानवरों के वस्त्रों - ऊँट व बैल की झूलें - तथा बहली, रथ के परदे और तम्बू कनातों को सजाने के लिए किया जाता है। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 50
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q14. गोटा किस प्रकार बुना जाता है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
सूती ताने पर बादले के बाने से बुनी बेल को गोटा कहते हैं। परीक्षा दृष्टि: चौड़ाई के अनुसार गोटा चौमास्या व आठमास्या कहलाता है, तथा चौड़ा गोटा लप्पा और कम चौड़ाई वाला लप्पी कहलाता है - गोटा, लप्पा, लप्पी व बांकड़ी इसके विविध प्रकार हैं। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 50
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q15. अलग-अलग रंग के कपड़ों को विविध डिजायनों में काटकर सिलाई करने की शेखावाटी की तकनीक क्या कहलाती है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
शेखावाटी में अलग-अलग रंग के कपड़ों को विविध डिजायनों में काट कर कपड़े पर सिलाई की जाती है जिसे पेचवर्क कहते हैं। परीक्षा दृष्टि: सीकर व झुंझुनूं की स्त्रियाँ लाल गोटे की ओढ़नियों पर कशीदे का काम करती हैं जिनमें ऊँट, मोर, बैल, हाथी व घोड़े बने होते हैं। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 50
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q16. सवाई जयसिंह द्वारा स्थापित छत्तीस कारखानों में से वस्त्रों से संबंधित कारखाने कौनसे थे?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
सवाई जयसिंह द्वारा स्थापित छत्तीस कारखानों में से सीवन खाना, रंगखाना और छापाखाना वस्त्रों से संबंधित थे, जहाँ क्रमशः कपड़े सिले, रंगे एवं छापे जाते थे। परीक्षा दृष्टि: सूरतखाना इन्हीं छत्तीस कारखानों में से था पर वह चित्रकला से जुड़ा था - इसी अंतर पर प्रश्न बनते हैं। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 49
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q17. लहरिया कितने रंगों में बनाया जाता है और मांगलिक अवसरों पर कौनसा पहना जाता है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
लहरिए एक, दो, तीन, पांच और सात रंगों में बनाए जाते हैं। पांच संख्या शुभ मानी जाती है, इसलिए मांगलिक अवसरों पर पंचरंग लहरिया पहना जाता है। परीक्षा दृष्टि: श्रावण में विशेषकर तीज के अवसर पर स्त्रियाँ लहरिया भांत की ओढ़नी तथा पुरुष लहरिया पगड़ी पहनते हैं। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 49
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q18. 'राजाशाही' लहरिया किन रंगरेजों की देन है और उसकी पहचान क्या है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
जयपुर के रंगरेज और नीलगर राजाशाही लहरिया रंगते थे जिसमें चमकदार गुलाबी रंग की आड़ी रेखाएं बनती थीं। परीक्षा दृष्टि: लहरिए की कई भांतें प्रचलित थीं और 'प्रतापसाही' लहरिये का उल्लेख साहित्य में मिलता है। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 49
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q19. 'समुद्र लहर' लहरिया की विशेषता क्या है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
समुद्र लहर का लहरिया जयपुर के रंगरेज रंगते हैं, इसमें चौड़ी-चौड़ी आड़ी धारियाँ बनती हैं और यह भी दो, तीन, पांच और सात रंगों में बनता है। परीक्षा दृष्टि: रंगरेज चौकड़ी, चौकड़ी का जाल, पतंगा और धनक आदि भाँतें भी रंगते हैं। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 49
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q20. कुर्ती के नीचे पहनी जाने वाली बांह वाली अंगिया को क्या कहते हैं?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
कुर्ती के नीचे कांचली अर्थात् बांह वाली अंगिया पहनी जाती थी, और कुर्ती का प्रचलन आज भी मारवाड़ में है। परीक्षा दृष्टि: प्रारम्भ में जो अधोवस्त्र कमर में लपेटा जाता था वही कालान्तर में घाघरा और घेरदार कलियों वाला घाघरा बना, जिसका छोटा रूप लहंगा है। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 49
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q21. कालीबंगा और आहड़ से मिले किन पुरातात्विक साक्ष्यों से सूती वस्त्रों के प्रचलन का प्रमाण मिलता है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
कालीबंगा और आहड़ सभ्यता के काल से ही राजस्थान में सूती वस्त्रों का चलन था - इन स्थानों से उत्खनन में प्राप्त रुई कातने के चक्र और तकली इस बात के प्रमाण हैं कि उस काल के लोग रुई के वस्त्रों का उपयोग करते थे। परीक्षा दृष्टि: उसी काल में स्त्रियाँ मिट्टी और चमकदार पत्थरों के आभूषण धारण करती थीं, जिसका पता शुंगकालीन मिट्टी के खिलौनों व फलकों से चलता है। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 48 व 51
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q22. मुगलों के सम्पर्क से राजस्थान में प्रचलित हुई पगड़ी शैलियों में कौनसा समूह सही है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
मुगलों के सम्पर्क से परिधानों में विविधता आयी और पगड़ियों में अटपटी, अमरशाही, उदेशाही, खंजरशाही, शिवशाही, विजयशाही तथा शाहजहानी शैलियाँ मुख्य रहीं। परीक्षा दृष्टि: तुर्रे, सरपेच, बालाबन्दी, धुगधुगी, गोसपेच, पछेवड़ी, लटकन व फतेपेच पगड़ी को चमकीली बनाने के आभूषण हैं, जबकि तनसुख, दुतई, गाबा, गदर, मिरजाई, डोढी, कानो व डगला अंगरखी के नाम हैं। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 48-49
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q23. दांतों में सोने के पत्तर की खोल बनाकर चढ़ाई जाती है, उसे क्या कहते हैं?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
दांतों में सोने के पत्तर की खोल बनाकर चढ़ाई जाती है जिसे रखन कहते हैं। परीक्षा दृष्टि: नाक में पहने जाने वाले आभूषणों में नथ, बेसर, बारी, भोगली, कांटा, चूनी, चोप व भँवरकड़ी आते हैं तथा कमर में कन्दोरा या करधनी पहनी जाती है - नाम मिलते-जुलते होने से भ्रम होता है। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 51
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q24. लाख से निर्मित चूड़ी तथा काँच की चूड़ी क्रमशः किन नामों से जानी जाती हैं?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
हाथों में पहने जाने वाले आभूषणों में मोकड़ी लाख से निर्मित चूड़ी है और कातर्या काँच की चूड़ी है। परीक्षा दृष्टि: इसी श्रेणी में कड़ा, कंकण, नोगरी, चांट, गजरा, गोखरू व चूड़ी प्रमुख हैं, जबकि उंगलियों में बींटी, दामणा, हथपान व छड़ा पहने जाते हैं। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 51
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q25. ठोस सोने की 'कुड़क' किस नाम से जानी जाती है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
बच्चों का कान छिदवाकर सोने या जस्ते की कुड़क पहना दी जाती है, और ठोस सोने की कुड़क मुरकी कहलाती है। परीक्षा दृष्टि: बच्चों के आभूषणों में हँसुली, कड़े, हाथ-पाँव के कड़ों को कहा जाने वाला कडूल्या, तथा घूंघरियाँ लगी पतली साँकली - झाँझर्या या पैंजणी - प्रमुख हैं। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 51-52
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q26. चांदी के आभूषणों की 'तारकशी' कला किस नगरी की प्रसिद्धि है?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
नाथद्वारा श्रीनाथजी की नगरी है जो अपने चांदी के आभूषणों की तारकशी - धातु के बारीक तारों से निर्मित काम - के लिए प्रसिद्ध है। परीक्षा दृष्टि: जयपुर आभूषण और रत्न व्यवसाय के लिए विश्व प्रसिद्ध है, जहाँ का प्रमुख बाजार जौहरी बाजार है। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 52
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
Q27. जयपुर के प्रमुख चौपड़ का नाम 'माणक चौक' क्यों रखा गया?
📚 विस्तृत व्याख्या / Explanation
जयपुर की सबसे प्रमुख चौपड़ का नाम माणक चौक रखा गया क्योंकि माणक को रत्नों का सरताज माना जाता है। परीक्षा दृष्टि: जयपुर की स्थापना के समय संस्थापक के मन-मस्तिष्क में आभूषणों की महत्ता का अंदाज़ा इसी से लगता है कि उन्होंने प्रमुख बाजार का नाम जौहरी बाजार रखा। स्रोत: अध्याय 4, पृ. 52
ईमेल / मोबाइल नंबर यहाँ न लिखें — वे सेव नहीं होते।
आधिकारिक स्रोतों से जानकारी / Sourced from Official Sites
सभी पोस्ट RPSC, RSMSSB, SSC, UPSC और केन्द्रीय सरकार की आधिकारिक वेबसाइटों से सत्यापित होती हैं। All posts are verified from RPSC, RSMSSB, SSC, UPSC and Central Govt official sites.
✅ RPSC Official✅ RSMSSB Official✅ SSC / UPSC
Rajasthan Current Pulse — राजस्थान के वस्त्र एवं...
⚠️ महत्वपूर्ण: यह एक निजी सूचना पोर्टल है और
राजस्थान सरकार या किसी भी सरकारी विभाग, आयोग अथवा बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट
नहीं है। यहाँ दी गई जानकारी केवल सुविधा के लिए है — आवेदन करने
से पहले आधिकारिक अधिसूचना से पुष्टि अवश्य करें। हम न कोई आवेदन
शुल्क लेते हैं, न नौकरी दिलाने का दावा करते हैं।
रोज़ नया क्विज़ — सीधे WhatsApp पर
27 MCQ जैसे प्रैक्टिस सेट — हर सवाल की विस्तृत व्याख्या के साथ